कमी


मैंने अक्सर अस्पताल में अमीरों को चक्कर काटते देखा है। ऐसी बात नहीं है कि, ग़रीबी और बीमारी इनका कोई मेल होना स्वाभाविक नहीं। गंभीर बीमारियों से लड़ते रहने के लिए जेब खाली होना जरूरी तो नहीं, पर अपरिहार्य तो है ही। सड़क किनारे बैठे हकीम पर ग़रीब को विश्वास होना स्वाभाविक है या नहीं ये तो मुझे पता नहीं, लेकिन आसमान छूती अस्पतालों की तगड़ी फीस भरने की "उम्मीदों" पर हक़ीम का "भरोसा" अक्सर भारी पड़ जाता है।
क्या ईश्वर लोगों की हैसियत देख कर उन्हें बीमार करता है? क्या बीमारियां हैसियत देखकर दरवाजें पर दस्तक देती हैं ?
पिछली दफ़ा, बगल में बैठी मेरी माँ की हमउम्र महिला को मेरी तरफ देखकर सिसकते हुए देखा था। भावनाओं के इस भवंडर के बारे में पूछने पर पता चला कि, उसका मेरी ही तरह दिखने वाला लड़का कैंसर की वज़ह से इस दुनिया से चल बसा था।
दो वक़्त की रोटी पर जब कैंसर भारी पड़ जाता है, तो बात सोचने वाली है। दर्द और मौत एक ही रास्ते पर सफर तय करते है। किसीकी मौत दर्दनाक होती है। किसीका दर्द मौत से बढ़कर होता है। किसीकी मौत अवसाद पैदा कर सकती है। लेकिन जिंदा मौत की बात अलग होती है। किसीका जिंदा होना पर उसका आपके लिए और आपका उसके लिए मर जाना भी मौत से कम नहीं।
कुछ दर्द iodex और moov से परे होते हैं। 
विकलांग बच्चे को कमर पर उठाकर चलते रहना भी एक दर्द है। यहाँ कमर दर्द होते रहना एक आदत बन जाती है। और जब आदतों को आदतों की आदत लग जाये तो दर्द अपना अस्तित्व भूल जाता है। और इस दर्द का गायब होना जरूरी है। ना कि उस माँ के लिए, शायद उसके बच्चे के लिए भी। कहते है ना, 
"चाँद की गैरमौजूदगी में सितारें खुलकर मुस्कुराया करते हैं।"
-नीरज

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