रात..

रात भी सोती नहीं है..
चाँद और तारों के खातिर खुद जागती रहती है।
जाग रही है,
अपने बच्चों के खातिर..
निकल पड़ा है चाँद सफर पर,
शब से सहर तक की मन्जिल तय करता हुआ,
रात देख रही है,
कही भटक ना जाए वो।
टिमटिमा रहे हैं ये तारें..
जैसे आसमां के बगीचे में फूल बिखरे पड़े हो सारे..
माँ ने जो कहा है, इन्हें
चाँद के सहर से जा मिलने तक,
टिमटिमाते रहना।
ये रात भी खुद सोती नही॔।
टूटे हुए तारों को भी,
पनाह देती है,
जिन्हें अंजुमन की फ़िक्र नहीं।

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