मरहम

बाब-ए-सुख़न हूँ,
तेरे नज्म़-ए-इश्क का,
तुम्हारी इस नज्म़ की,
हम गझ़ल बन बैठे।
सुलग रहे थे जख्म़ कई,
इस गद्य में,
ऐ चारागर,
तुम मरहम के दो शब्द बन बैठे।
बाब-ए-सुख़न = Chapter of Poetry
चारागर = Healer
©नीरज

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